वैद्य करे आरोग्यवर्द्धिनी वटी का ऐसे उपयोग मिलेंगे अच्छे परिणाम, जाने क्या हैं आरोग्यवर्द्धिनी वटी उपयोग करने का सही तरीका?

आरोग्यवर्द्धिनी वटी के गुण और उपयोग करने का सही तरीका और मात्रा नीचे विस्तार से बताई गई हुई हैं। चलिए जानते हैं आरोग्यवर्द्धिनी वटी को किन किन बीमारियों मे और कैसे उपयोग करते हैं –

Arogyavardhini vati ayurvedic medicine use and composition

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आरोग्यवर्द्धिनी वटी मे उपयोगी रस औषधियाँ और कष्ट औषधियाँ 

औषध मात्रा
शुद्ध पारा 1 तोला
शुद्ध गन्धक 1 तोला
लौह भस्म 1 तोला
अभ्रक भस्म 1 तोला
ताम्र भस्म 1 तोला
हरें, बहेड़ा, आँवला प्रत्येक 2-2 तोला
शुद्ध शिलाजीत 3 तोला
शुद्ध गुग्गुलु 4 तोला
चित्रकमूल छाल 4 तोला
कुटकी 22 तोला

आरोग्यवर्द्धिनी वटी बनाने की विधि –

प्रथम पारद गन्धक की कज्जली बना उसमें अन्य भस्मों तथा शुद्ध शिलाजीत और शेष द्रव्यों का कपड़छन चूर्ण मिलावे पीछे गुग्गुलु को नीम की खजी पक्षी के रस में दो दिन तक भिगो हाथ से मसल, कपड़े से छान, उसमें अन्य दवा मिलाकर मर्दन करें। नीम की ताजी पत्ती के रस में मर्दन कर 22 रत्ती की गोलियाँ बना, सुखा कर रख लें। 

आरोग्यवर्द्धिनी वटी का मात्रा और अनुपान (र. र. स.)

2 से 4 गोली रोगानुसार जल, दूध पुनर्नवादि क्वाथ या केवल पुनर्नवा का क्वाथ, दशमूल- क्वाथ के साथ दें। 

आरोग्यवर्द्धिनी वटी के गुण और उपयोग

यह रसायन उत्तम पाचन, दीपन, शरीर के स्रोतों का शोधन करनेवाला, हृदय को बल देनेवाला, मेद को कम करनेवाला और मलों की शुद्धि करने वाला है। यकृत (Liver) प्लीहा (Spleen), बस्ति (bladder), वृक्क (Kidney), गर्भाशय (Uterus), अन्त्र (intestine), हृदय आदि शरीर के किसी भी अन्तरावयव के शोथ में, जीर्ण ज्वर, जलोदर और पाण्डु रोग में इस औषध से अधिक लाभ होता है 

पाण्डुरोग में यदि दस्त पतले और अधिक होते हों, तो इसका प्रयोग न कर पर्पटी के योगों का प्रयोग करना चाहिए। सर्वाङ्ग शोथ और जलोदर में रोगी को केवल गाय के दूध के पथ्य पर रख कर इसका प्रयोग करना चाहिए।(alert-warning)

यकृत् की वृद्धि के कारण शोथ हो, तो पुनर्नवाष्टक क्वाथ में रोहेड़ा की छाल और शरपुंखामूल 1-1 भाग अधिक मिलाकर उसके अनुपान से इसका प्रयोग करें। 

यदि हृद्रोगजन्य शोथ हो तो आरोग्यवर्धिनी के साथ “डिजिटेसिस पत्र” चूर्ण आधी से 1 रती और जंगली प्याज (वन पलाण्डु का चूर्ण 1-2 रती मिलाकर पुनर्नवादि या दशमूल क्वाथ के साथ इसका प्रयोग करें। 

जीर्णफुफ्फुसधरा कला शोथ में इसके साथ शृंग भस्म 4-8 रत्ती मिलाकर भारङ्गी- मूल, पुनर्नवा, देवदार और अब्रूला के बजाय के साथ इसका प्रयोग करें मेद (च) कम करने के लिये रोगी को केवल गाय के दूध पर रख कर महामंजिष्ठादि क्वाथ के अनुपान इसका सेवन करावें।

यही बटी वृहदन्त्र तथा लघु अन्त्र की विकृति को नष्ट करती है, जिससे आन्त्र-विषजन्य रक्त की विकृति दूर होने से कुष्ठ आदि रोग नष्ट हो जाते हैं। इससे पाचक रस की उत्पत्ति होती है और यकृत् बलवान होता है। अतः यह पुराने अजीर्ण, अग्निमांद्य और यकृत् दौर्बल्य में लाभ करती है। सर्वाङ्ग शोध में होने वाले हृदयदौर्बल्य को यह मिटाती है और मूत्र मार्ग से जलांश को बाहर निकाल शोध को कम करती है। पाचन शक्ति को तीव्र करके धातुओं का समीकरण करने के कारण यह मेदोदोष में लाभदायक है। मलावरोध नष्ट करने के लिये यह उत्तम औषध है। दुष्ट व्रण में वात-पित्त की अधिकता होने पर इसके सेवन से लाभ होता है। शरीरपोषक ग्रांथियों की कमजोरी या विकृति से शरीर की वृद्धि रुक जाती है और शरीर निर्जीव सा हो जाता है। इस तरह जवानी आने पर भी महिला और पुरुष में स्वाभाविक चिन्हों का उदय नहीं होना ऐसी अवस्था में इस वटी के निरन्तर प्रयोग से लाभ होते देखा गया है। यह पुराने वृक्क विकार में भी लाभ करती है। प्रमेह और कब्ज में अपचन होने पर भी यह लाभ करती है। हिक्का रोग में भी इसके प्रयोग से हिक्का नष्ट हो जाती है परन्तु 

आरोग्यवर्द्धिनी वटी गर्भिणी स्त्री, दाह, मोह, तृष्णा, भ्रम और पित्त प्रकोपयुक्त रोगी को नहीं देना चाहिए। (alert-error)

 

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कुष्ठ रोग की प्रारम्भिक मे आरोग्यवर्द्धिनी वटी उपयोग 

कुष्ठ रोग की प्रारम्भिक अवस्था में इसका उपयोग करने से शीघ्र लाभ होता है। पुराने कुष्ठ रोगों में अर्थात् जब रक्त और मांस दूषित हो, मवाद रूप में परिणत होकर बहने लगे जैसा गलित कुष्ठ; तो इसमें यह लाभ नहीं करती है। विशेषतया वात और कफ प्रधान या वात-कफ प्रधान कुष्ठ — जैसे – कपाल, मण्डल, विपादिका, चर्मदलादि और अशमक पर इसका प्रयोग करने से शीघ्र लाभ होता है। इस दवा के सेवन काल में पथ्य में बराबर दूध का ही सेवन करना चाहिए।

औदुम्बर कुष्ठ में शरीर की त्वचा विकृत और रूक्ष हो जाती है तथा स्पर्श- ज्ञान का लोप हो जाता है। अर्थात् जहाँ धब्बे पड़ जाते हैं उसे स्पर्श करने से उसको छूने तक का ज्ञान नहीं होता है। ये धब्बे लाल और ऊपर उठे पके हुए गूलर फल के समान होते हैं। उसमें से पसीना अधिक निकलता रहता है। ऐसी अवस्था में केवल आरोग्यवर्द्धिनी न देकर गन्धक रसायन के साथ इसे देना अच्छा है और भोजनोपरान्त खदिरारिष्ट 2 तोला बराबर जल मिश्रित कर के दोनों शाम देना चाहिए। इससे बहुत शीघ्र लाभ होता है।

कभी-कभी रक्त विकृति के कारण शरीर में लाल चट्टे पड़ जाते हैं उनसे खुजली होती है तथा बाद में पूय पड़ जाता है। कभी-कभी खुजलाने पर लाल चट्टे होकर मवाद भर जाता है। ऐसी अवस्था में आरोग्यवर्द्धिनी बटी महामंजिष्ठादि अर्क के साथ या नीम की छाल के क्वाथ के साथ देने से विशेष लाभ होता है।

रक्त और मांस की विकृति के कारण त्वचा विकृत हो जाती है। इसमें कफ और वायु की प्रधानता रहती है। अतः जहाँ की त्वचा विकृत हो जाती है, यहाँ की त्वचा रुक्ष होकर फट जाती है और उसमें से थोड़ा-थोड़ा मवाद भी निकलने लगता है। खुजलाने पर छोटी-छोटी फुन्सियाँ होकर पक जाती हैं, इसमें सुई कोंचने जैसी पीड़ा होती है। यह स्थान कठोर बन जाता है। ऐसी अवस्था में आरोग्यवर्धिनी वटी का उपयोग दूध के साथ करायें तथा ऊपर से सारिवाद्यासव 2 तोला बराबर जल मिलाकर पिलावें। गन्धक रसायन से भी अच्छा लाभ होता है।

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वात-पित्त-कफ दोषों से उत्पन्न ज्वरों में इसके प्रयोग से लाभ होता है। इसी तरह बद्ध- कोष्ठजनित ज्वर, आमाशय की विकृति से अपचन जनित ज्वर, बहुत दिनों तक बराबर आनेवाला स्वर और पित्त की विकृति से उत्पन्न होनेवाले ज्यरों में भी इसका प्रयोग किया जाता है।

मल-संचय हो जाने के कारण कफ की वृद्धि हो मन्दाग्नि हो जाने पर जी मिचलाना, वमन होना तथा उसमें कफ की झाग (फेन) निकलना, भूख न लगना, पेट भारी हो जाना, भोजन करने के बाद ही जी मिचलाना, तथा वमन होने की इच्छा होना, कभी-कभी वमन भी हो जाना, खाँसी, कफ सफेद तथा लेसदार गिरना, ऐसी अवस्था में आरोग्यवर्द्धिनी दें। इससे मल-संचय दूर हो कफ के विकार दूर हो जाते हैं और यह पित्त को बलवान बनाकर मन्दाग्नि को दूर करती है, जिससे अन्नादि का भी पाचन ठीक से होने लगता तथा कफ नष्ट हो जाने से वमनादि उपद्रव भी दूर हो जाते हैं।

यह गुटिका दीपन – पाचन भी है। अर्थात् पाचक पित्त की कमजोरी से अन्नादि की पाचन- क्रिया में गड़बड़ी होने लगती है, जिससे अपचन बराबर बना रहता है। आजकल ऐसे रोगों की कमी नहीं है और इस रोग से छुटकारा पाने के लिये लोग अनेक प्रकार के खट्टे-मीठे तथा चरपरे- जायकेदार चूर्ण का भी सेवन करते हैं। ऐसे चूणों के सेवन से तात्कालिक लाभ तो होता है, परन्तु बाद में रोग फिर जैसा का तैसा ही हो जाता है। इसके लिये आरोग्यवर्द्धिनी बटी का उपयोग करना बहुत श्रेष्ठ है, क्योंकि यह पाचक पित्त को सबल बना, पाचन शक्ति प्रदान करती है, जिससे मन्दाग्नि दूर हो, अन्नादि की पाचन- क्रिया ठीक होने लगती तथा भूख भी खुलकर लगने लगती है। 

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हृदय की निर्बलता में आरोग्यवर्द्धिनी वटी उपयोग 

Constipation अधिक होने के कारण बद्धकोष्ठ हो जाता है। जिससे कफादि की वृद्धि हो जाती और मन्दाग्नि भी हो जाती है। फिर अन्नादिक का पाचन ठीक से न होने के कारण रस- रक्तादि भी उचित परिमाण में नहीं बन पाते। अतः Red Blood Cells की वृद्धि न होकर शरीर में जल भाग की ही वृद्धि होती रहती है। ऐसी अवस्था में सर्वाङ्ग में सूजन होकर हृदय कमजोर हो जाता है जिससे हृदय अपना कार्य करने में असमर्थ हो जाता है। ऐसे समय में आरोग्यवर्द्धिनी बटी पुनर्नवादि क्वाथ के साथ देने से बहुत लाभ करती है।

Chronic Constipation होने से Intestine में मल चिपक जाता है, जिससे अंत में सेन्द्रिय विष (Organic toxic) की उत्पत्ति हो, मल शुष्क हो जाता है। मल शुष्क होते जाने से आंत की दीवारें सख्त (कठोर) हो जाती हैं। फिर आंतों की क्रिया में बुरा असर पड़ता है और उसने दर्द भी होने लगता है। यह दर्द साधारण चूरण- चटनी आदि से नहीं दबता, जब तक कि आंतों की शुद्धि न की जाय। यह कार्य आरोग्यवर्धिनी बटी त्रिफला स्वाथ के साथ अच्छी तरह कर देती है। इससे मल पिघल कर बाहर निकल आता है तथा आँत में कोमलता आ जाती है और वह अपना कार्य भी अच्छी तरह से करने लग जाती है।

सभी लोगों से निवेदन हैं ऊपर दिए गए योगों का बिना आयुर्वेदिक चिकित्सक परामर्श के सेवन ना करे। Comment करके आप अपनी समस्या या सुझाब हम तक पहुचा सकते हैं। 

जय आयुर्वेद  

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